अब
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
उसे नहलाती धुलाती,
ब्रश कराती,
और तो और खुद से पहले खाना भी खिलाती है,
चोट उसे लगी है इस कल्पना में भी,
वो खुद ही रोती है,
मेरी गुड़िया अब,
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
लड़कियाँ प्राकृतिक ही ऐसी होती हैं।
मातृत्व और त्याग लेकर ही जन्म लेती है,
जिसे जन्म दे दिया फिर ताउम्र उसके लिए ही जीती है,
मैं नही चाहती मेरी गुड़िया अपने जीवन मे करें व समझौते जो मैंने किया,
पर प्रकृति ने भला कब प्रवृति बदल दिया।
मैं माँ हूँ मेरी गुड़िया की,
पर मेरी गुड़िया भी तो अपनी गुड़िया की माँ होती है।
मेरी गुड़िया अब,
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
1 comment:
सुंदर रचना
आभार
सादर
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