Tuesday, October 23, 2018

चांदनी रात

चाँद की मध्यम और कभी तेज़ होती
रोशनी मीठी सी उष्णता
तो कभी थोड़ी नमकीन सी ठंडक के साथ
मेरे हाथों को थामे हाथों में
बिखरती छिटकती सी
चाँदनी खड़ी थी मेरे पास,
साँसे थम थम कर चल रही हो मानो
और रूह को कोई सुकून सा मिल गया हो,
एकटक चाँद को देख चल रही थी
उधेड़बुन
मानो कोई चेहरा एकटक
बड़ी बड़ी आंखों से देख रहा हो मुझे,
मध्यम सी हवाएं सर्द सर्द
सिहरा जा रही थी रोम रोम
और मन उड़ रहा था
बेलगाम घोड़े की तरह
कल्पनाओं के लोक में
सपनो के पर बाँधे,
तारों की टिमटिमाहट
अपने होने का एहसास दिल रहे थे
और मेरी नज़रें एकटक चाँद को निहार रही थी,
कोई तारा टूटा भी
और एकटक चाँद को देखना मानो
सारी मन्नते पूरी हो गयी
कोई मन्नत अंतर्मन में करवट भी न ली
और मैं पूरे सुकून और जतन से
निहारते निहारते चाँद को
सुबह का अलविदा कह दिया,
चाँदनी रात...
एक सुनहरे लाल सूरज में सिमट गई
और मेरी टकटकी मानो अल्पविराम पर रुक गयी...
चाँदनी रात,
मानो प्रेम का वो छोटा सा लम्हा जो
संतृप्त कर देता है तनमन और
पलक झपकाने की भी जरूरत न होती...
चाँदनी रात
इंतज़ार है अंधेरों के ये लंबे पन्द्रह दिन पार कर
चाँद फिर आएगा टूटते जुड़ते और
लेकर एक चाँदनी रात

सुप्रिया "रानू"

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