Wednesday, January 28, 2026

मेरी गुड़िया

मेरी गुड़िया 
अब 
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
उसे नहलाती धुलाती,
ब्रश कराती,
और तो और खुद से पहले खाना भी खिलाती है,
चोट उसे लगी है इस कल्पना में भी,
वो खुद ही रोती है,
मेरी गुड़िया अब,
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
लड़कियाँ प्राकृतिक ही ऐसी होती हैं।
मातृत्व और त्याग लेकर ही जन्म लेती है,
जिसे जन्म दे दिया फिर ताउम्र उसके लिए ही जीती है,
मैं नही चाहती मेरी गुड़िया अपने जीवन मे करें व समझौते जो मैंने किया,
पर प्रकृति ने भला कब प्रवृति बदल दिया।
मैं माँ हूँ मेरी गुड़िया की,
पर मेरी गुड़िया भी तो अपनी गुड़िया की माँ होती है।
मेरी गुड़िया अब,
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।

Thursday, October 30, 2025

मेरा आम बन पाना

मैं महान हूँ,
न जाने कितने काम जो दो लोग 
मिलकर करते हैं ,
जो कई लोग मिलकर करते हैं 
उन सबको मैं अकेले कर लेती हूँ, 
मैं महान हूँ
मुझे सारे रिश्ते निभा लेने हैं,
सब सुन लेना है सब सह लेना है,
मैं महान हूँ
मुझे कहीं भी बुरा नही बनना है,
मैं महान हूँ मुझे जीवन मे 
सभी सामाजिक सांस्कृतिक पारवारिक नैतिक 
दायित्व पूर्ण करने हैं,

लेकिन इस महान बनने में रह जाती है 
एक घुटन,
एक चुभन,
एक न पूरी होने वाली उम्मीद,
एक अपूर्ण आश
कई टूटे सपने,
और मेरा आम बन पाना।

Saturday, October 11, 2025

हम बेटियाँ

शादी के बाद हम काट दी गयी
जड़ों से
ससुराल और मायके हर जगह
कुछेक बातों के लिए 
तो कभी कुछेक आघातों के लिए,
कभी असीम प्रेम बना कारण
तो कभी चुप रह जाना हुआ वजह,
कभी सह जाना दुश्वार था 
कभी ना कह पाना ।
लेकिन जनना हमारे खून से लेकर रूह तक मे है,
हममें कोंपलें फूट आती हैं,
हर बार जब मायके 
का एक तिनका भी आकर स्पर्श कर जाए,
जिम्मेवारी एक भी गठरी
ससुराल से मिल जाये,
हम सब बिसरा कर फिर से खिल जाती हैं,
और महका देती हैं 
घर आँगन पीहर से लेकर  पी के घर तक का।
हम बेटियाँ धान हैं उगाई जाती हैं,
फिर जड़ से उखाड़ कर लगाई जाती हैं
फिर भी मन मन भर  चावल उगा देती हैं।



Thursday, September 11, 2025

प्रेम की सीमाएं

प्रेम में सदैव तय करना सीमाएँ,
असीम कुछ भी अस्तित्व में नही होता,
वह कल्पना मात्र ही है,यथार्थ से परे,
प्रेम में सदैव तय करना सीमाएं,
अनुमति किस बात की कब तक लेनी है:
अनुमति स्पर्श की,
अनुमति व्यंग्य की,
अनुमति हास्य की, 
अनुमति अपनी जड़ों के सानिध्य की,
अनुमति समाज के नियमों की,
जाना कहाँ तक है : 
त्याग में खुद को गंवाए बिना,
समर्पण में स्वयं को लुटाए बिना,
आदर देने में निरादर हुए बिना,
सेवा करने में खुद को शोषित किये बिना,
स्वार्थ में दूसरों के हित गंवाए बिना,
स्वतंत्र कितना होना है,
अपने पंख फैलाने तक,
कुरीतियों को तोड़ने तक... या,
नई कुरीतियां लाने तक,
प्रकृति प्रदत दो अस्तित्व मिटाने तक...
प्रेम सीमित रखना सदा की ,
प्रेम दो लोगो के बीच 
उनके वास्तविक अस्तित्व को संजोए
प्रेम अपने अस्तित्व को बचाये रखे।

Wednesday, July 9, 2025

विस्मृति

मैं विस्मृत कर देना चाहती हूँ
अपने जीवन मे अनुभूत सभी कड़वे स्वादों को
जो किसी न किसी रिश्ते से मिले,
इसलिए नही की उन्हें माफ कर दिया,
अपितु इसलिए कि 
जीवन में जब भी उस तरह के रिश्ते में बंधी,
तो घोल न पाउँ अपने अंतर्मन में बैठे इस कड़वाहट को,
जो ताने मैं बहु बनकर सुनी वो अपनी बहू 
को न सुनाऊँ,
जिस प्रेम से वंचित मैं ननद बन कर रही ,
उससे अधिक प्रेम अपनी ननद को दे पाऊं,
बिटिया के होने पर सबके उतरे चेहरे जो देखें,
वो अपने नतिनी और पोती के लिए अनन्त प्रेम बरसाऊँ
मैं विस्मृत कर देना चाहती हूँ 
अपने जीवन की हर कड़वाहट
ताकि प्रकृति को भविष्य में 
सिर्फ प्रेम दे पाउँ
प्रेम के बीज बोउँ 
और प्रेम के ही वट वृक्ष उगाउँ।

Wednesday, March 20, 2024

गौरैया

चहकती फुदकती
मीठे मिश्री दानों के 
सरीखे आवाज़
गूंजता था तुम्हारे आने से
बचपन की सुबह का हर साज़
घर के रोशनदान
पंखे के ऊपरी हिस्से 
कभी दीवार की छोटी सुराखों
में बना होता था तुम्हारा छोटा सा मकान
न जाने कितनी बार तुम्हारे बच्चे जब 
गिरते थे धरा पर कितनी 
हिफ़ाज़तों से रखते थे हम बच्चे
उन्हें घर मे 
और तुम उस पूरे समय बेकल रहती थी,
कहीं ये मानव मार न दे मेरे बच्चे को 
इसी डर में 
इतनी बड़ी दुनिया मे तुम छोटी सी चिड़िया 
के रहने के सारे संसाधन कम हो गए,
बुद्धिजीवी श्रेष्ठ जीव बन कर भी 
हम तुम्हारा लोप हो जाना सह गए,
अब भी तो जागना बनता है,
थोड़ा अपनी सुविधाओं से समझौता कर 
तुम गौरैयों का एक घर तो हम सबके घर मे जंचता है।
आ जाओ वापस की हमने बना डाले हैं रोशनदान हर घर में,
अलार्म को छोड़ तुम्हारी आवाज़ से रोज ऑंखे खोलने का सुकून भी आ जाये अब शहर में ।

Thursday, January 4, 2024

क्या प्रेम जताया या बताया जाता है?

प्रेम तो सिर्फ कर पाने की चीज़ है,
न उसे बताया
न उसे जताया जा सकता है,
न उसे खोया 
न पाया जा सकता है,
निश्चय ही,
अनुभूति और निःशब्द 
हो जाना ही प्रेम की वास्तविक परिभाषा होगी,
क्योंकि शब्द तो सीमाओं में बंधे होते हैं,
और जताना तो थोपी जाने वाली भाषा होगी,
प्रेम तो परिणाम से अनभिज्ञ,
निरन्तर विस्तार को प्रतिज्ञ,
और स्वयं को भूल जाने को भिज्ञ
रहकर भी प्रेम में डूबने को प्रतिबद्ध
निर्बाध बहते जमे वाली भावना है,
जो परे है स्वार्थ से,यश और प्रवंचना से
जो प्रतिबद्ध नही है ,अभिव्यनजना से,
प्रेम तो बहते जाना है 
निर्बाध सरि की भाँति,
आनेवाले पठार समतल और वृक्षों की जड़ों 
से कट जाने के भय से अनजान होकर
प्रेम कर पाने और हो जाने की भावना है,
असीमित हो जाने की संभावना है। 





मेरी गुड़िया

मेरी गुड़िया  अब  अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है। उसे नहलाती धुलाती, ब्रश कराती, और तो और खुद से पहले खाना भी खिलाती है, चोट उसे लगी है इस कल्...