अपनी सुविधाओं के असीम विस्तार से,
कुछ धनोपार्जन और कुछ आलास के बाजार से,
धीरे धीरे तुम्हे लोप करते जाने के व्यापार से,
बढ़ाकर तुम्हारे इर्द गिर्द वैश्विक तापमान,
होने नही दिया आसमान को भी भान,
कहता मानव अब भी बनकर अनजान,
उफ्फ ना करना,
जैसे सहती आयी हो,
वैसे ही सहते जाना
ओ धरा अभी जरा और चुप रहते जाना ।
काटकर जंगलों को ,
बनाकर बहुमंजिला इमारतें
देखो हम इसके आसपास पौधे लगा रहे हैं,
तुम्हे समझ भी आ रहा हम कैसे हरियाली बढ़ा रहे हैं,
समुद्रों के तट पर अनगिन प्लास्टिक फेंक कर
अनगिन समुद्री जीवों की जान लेकर
हम धरती से प्लास्टिक हटा रहे हैं,
वसुधा तनिक धीर धरो,
हम प्रदूषण घटा रहे हैं,
समो के तुम्हारे गर्भ में कचरों का पहाड़,
बंजर कर के उर तुम्हारा,
हम प्रगति से कर रहे दहाड़,
ओ अचला यूंही अचल रहना,
हम इंसान तुम्हे इंसानों से बचा रहे हैं।
ऊर्जा के अनवीकरणीय श्रोतों का कर उपभोग,
अब नवीकरणीय की ओर जा रहे हैं,
"हमारी शक्ति हमारा ग्रह" के नारे लगा रहे हैं,
कर के दूषित तुम्हारी ही नदियों का पानी,
उसके सफाई का अभियान चला रहे हैं,
ओ धरित्री धीरज धरो,
हम वैश्विक तापमान घटा रहे हैं
माँ कहकर तुम्हे अब
तुम्हे बचाने संजोने को हर बरस
पृथ्वी दिवस मना रहे हैं।
ओ रत्नगर्भा तुम्हारे ही गर्भ से जीवन पाकर
तुम्हारे ही जीवन को दुष्कर बना रहे हैं,
सुनो वसुंधरा यह भेद न कहना,
ओ धरा अभी चुप ही रहना,
हम कर के अनगिन प्रदूषण
बस यही कहते जा रहे
ओ धरा अभी चुप रहना।