Friday, November 16, 2018

अतिथि ही रह गयी

सुनती आयी हूँ बचपन से ही,
ससुराल ही लड़की का घर होता है,
मायका तो कुछ दिन का रैन बसेरा...
लेकिन यथार्थ भिन्न है इन बातों से,
शब्दों में लिख रही मैं हर वो
भाव , छिन्न है हर स्त्री जिन आघातों से,

घर मेरा है तो फिर इसमें
मेरे मायके से आये सामान ही क्यों हो,
घर मेरा है तो फिर मेरे घर मे मुझे
सारा बोरिया बिस्तर लेके आने की क्या जरूरत,
घर मेरा है तो फिर सभी रिश्तेदारों के तोहफे
मेरे रैन बसेरे के क्यों आएं,
घर मेरा है तो फिर क्यों मैं एक कमरे में सिमट जाऊँ,
घर मेरा है तो फिर क्यों मैं
अपनी पसंद का खाना भी न पका पाऊँ,
घर मेरा है तो क्यों मेरी जिम्मेवारी निभाने के
सारे नियम कड़े हो,
बहु हूँ, और घर मेरा इसलिए थक
कर भी हर पल मेरे पैर खड़े हो,
मेरी कोई इक्षा न हो
बाकी सब जिद पे अड़े हो,
घर मेरा ही तो है फिर क्यों मैं
रोटी बनाते वक्त भी पानी पीऊं तो हाथ धुलु,
घर मेरा ही है तो फिर क्यों मैं सबसे आखिर में खाऊँ,
घर मेरा ही है फिर भी क्यों मैं अपने मायके
अनुमति लेकर जाऊँ,
घर मेरा ही है फिर क्यों मैं अपने सारे सपने
चूल्हे चौके कपड़े बर्तन में झोकूँ,
घर मेरा ही है फिर क्यों मैं सारी में बंध के रह जाऊँ,
आजीवन निस्वार्थ और बिना किसी हिचक के सेवा दूँ,
सच तो बस इतना है कि
घर मेरा है फिर भी हर पल
इस घर मे मैं खुद को अतिथि ही नज़र आऊं...
ज़माना बढ़ा है आगे चीजें बदल भी गयी हैं,
पर सूक्ष्मता से देखिए
अभी भी कितने घरों की बहुएं
उस घर मे अतिथि ही हैं...
उम्र ढला, समय बदला, मौसम बदले
सूरज उगा और  ढला,
पर कुछ हिस्सों में कुछ न बदला,
बेशक लड़कियां अब कैद से निकल गयी,
पर अभी भी कई बहुएं अपने घरों में
अतिथि ही रह गयी....

सुप्रिया "रानू"

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