की अपनी सारी ख्वाहिशें कत्लेआम हुई...
क्या हुआ जो बेमतलब की बनाई इज़्ज़त बदनाम हुई...
मैंने तो मान लिया उसे रब उसकी मोहब्बत है अब खुदाई.
दिलोजान की हर हसरत मेरी चाहत की अरमान हुई,
मैं बन बैठा अब जमीन वो मेरी आसमान हुई...
मेरी वफ़ा है मेरी बन्दगी, मेरी रूह तो उसपे ही कुर्बान हुई,
आंखे मूँद लूं तो ख्वाबों में खिलखिला उठती है वो,
जो रूबरू होक गुजर जाए बस इतने में मेरी चाहत एहतराम हुई...
इन्तज़ारे यार के वास्ते राहों में गुलाब बिखेरा है,
दीदारे यार की इंतज़ा है,वास्ता अपनी मोहबब्बत का दे रखा है,
ख्वाब उसके ही देखती हैं नज़रे किसे खबर है
कब सुबह कब शाम हुई
इस दिल मे ज़िंदा रहेंगी मेरी वफ़ाएँ
मेरा ज़ज़्बा ये ताउम्र इंतज़ार का एक नया पैगाम हुई...
उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई सरेआम हुई...