Tuesday, January 21, 2020
चिंगारी
Wednesday, July 31, 2019
मन ही तो है
मैं लाख मनाती हूँ,
कभी थम जाता है,
तो कभी ज़िद पे अड़ जाता है
मन ही तो है,
जानता है कहने को हैं
बस अपने अपने होने का
असल फ़र्ज़ कौन निभाता है,
सौ नुकसान झेल कर
न जाने क्यों एक और झेलने में
उबल आता है
मन ही तो है,
जानता है सारी चाहते पूरी
नही होती ज़िन्दगी में
सारे हालातों से समझौते करता है,
समझौतों की फिराक में कभी
उबल ही जाता है
मन ही तो है,
जानता है,ज़िन्दगी आसान नही है
हर सफर कांटों पे चलता है,
पर हर वक़्त जब कांटे ही मिले
तब तो फूल को कहना बनता है
क्या करे फुट ही आता है
मन ही तो है,
जानता है माँ बाप नही नन सकता कोई भी
फिर क्यों बेमतलब
लोग अपनी अदाकारी का पर्दा डालते हैं
उबल आता है
मन ही तो है,
मैं लाख मनाती हूँ,
कभी मान जाता है
तो कभी एकदम से अड़ ही जाता है मन ही तो है.....
सुप्रिया "रानू"
Monday, July 22, 2019
एहसास
ये न शब्दों में कह पाती हूँ,
न अश्क़ों में रख पाती हूँ,
मन से महसूस कर के
मन के ही कोने में धर जाती हूँ,
ये मेरे अहसासों की दास्तान है
जुबान से कहाँ बयान है।
बचपन मे खिलौनों की ज़िद
और उन्हें पाने के बाद का एहसास,
बारिश में भीगने की ज़िद
और जी भर भीग लेने का एहसास,
छोटी छोटी बातों पर झगड़ना
और फिर रूठे दोस्तों के मन जाने का एहसास,
मन के एक कोने में धर रखा है सबको जतन से,
ये न होंगे बयान अब कथन से ।
ये मेरे एहसासों की दास्तान है.....
यौवन और उसके तेज़ तेवर
जो चीज़ पाना हो मुश्किल उसकी ही ज़िद
और लगा देना जी जान
थोड़ी सी ताकत थोड़ा सा आन
पिघल जाना पल में
और ठन जाना बेबाक,
पहले प्यार की खुमारी
और फिर उसे भूल जाने में गुजरी उम्र सारी,
एहसासों का ही तो ये यौवन है,
धड़कता इनकी यादों में जीवन है
ये मेरे एहसासों की दास्तान है....
खेल कूद में गिरकर छिले घुटनो का दर्द,
प्रेम की मात में टूटे हृदय का दर्द,
असफलताओं में खोई सफलताओं की कोशिशों के दर्द,
छूते छूते छुटे हुए आसमान का दर्द,
ज़िन्दगी वक़्त,हालात,रिश्तों से मिले
दर्द और ताउम्र दर्दों की सौगात का दर्द
एहसास ही तो है सबका
न कोई मात्रा न कोई हर्फ़
न कोई नज़्म न कोई कविता
उभर पाती हैं इन एहसासों की जुबान को
कैसे लिख दूँ मैं एहसासों के दास्तान को
ये मेरे एहसासों की दास्तान है,
मन के एक कोने में धर रखा है जतन से
ये अब न बयान हो पाएंगे किसी कथन से
सुप्रिया "रानू"
Sunday, July 7, 2019
गर्भपात: एक अन्तःव्यथा
तुमने जन्म भी नही लिया,
और मृत्यु के ग्रास में समा गए,
सोच कर सोचती रह जाती हूँ,
शब्दों में अपनी व्यथा न कह पाती हूँ,
वो जो सपने और उम्मीदें थी तुमसे जुड़ गई
कैसे तोड़ दूँ उनकी एक एक कड़ी,
लगा के फिर कोई उम्मीद नई ।
अभी का दौर और जीव विज्ञान की पढ़ाई,
तुम्हारे पल पल की वृद्धि की खबर मैं रख पाई,
आज वही अंतर्द्वंद की स्थिति है,
टुकड़ो और बूंदो में देखना तुम्हे ही परिस्थिति है
मन व्यथित होके बस इतना ही कह पता है,
न जला पायी न दफना पायी,
बून्द बून्द रक्त से सींचा था जैसे,
वैसे ही बून्द बून्द तुम्हारे अस्तित्व को बहा पायी।
कैसे कह दूं कि तुम मेरे थे ही नही,
और कैसे मान लूं की यह नियति का खेल है,
कहीं न कहीं मेरी ही कोई गलती रही होगी
जो एक नन्ही जान के विकसित दौर को न बचा पायी ।
अंतः व्यथा के ये अनगिनत पहलू कोई न समझ पायेगा,
गलती होगी कोई तुममे यही हर कोई कह पायेगा,
पर एक माँ का ही मन जानता है
वो जन्म के पश्चात नही अपितु
गर्भधान से ही माँ बन जाती है,
कोइ दिखता भी नही और वो उसके सपने सजाती है,
दुविधा बस यही मन को सता गयी
तुम्हे देखा भी नही और तुमसे दूर हो गयी।
न जला पायी न दफना पायी,
ऐसी अभागन माँ है जो माँ वही न कहला पायी ।
Thursday, June 27, 2019
आयी बरखा सब तृप्त करने को
तपती जलती धरा को जल
से शीतल करने को,
सुखी पेड़ों की काया को
अमृत जीवन देने को,
आकुलित वन्य जीव
और मानव मन को
संतृप्त करने को ,
आयी बरखा एक एक
कोने को तृप्त करने को...
बेफसल धरा में आई जो दरारें हैं
उनको भरने को,
सूखते इन वृक्षों की शाख,
पत्तियों को हरा कर ,
नई कोंपलों के आगमन को,
धरा के अन्तस् में घटते जलस्तर
को संतुलित करने को,
तनमन हर्षित करने को
आयी बरखा एक एक कोने को तृप्त करने को...
धरा के भीतर छुपे अकुलाए
जीव जंतुओं के ऊपर आने को,
खोल के पंख सारे मयूर के नाच जाने को,
हरी अम्बियाको जल से धुलकर पक जाने को
भरकर खेतों में जल का स्तर
हरियाली धान के लग जाने को
प्रेम अम्बर का बरखा की बूंदों
के रूप में धरा को अर्पित करने को,
आयी बरखा एक एक कोने को तृप्त करने को...
फीकी फीकी रसोई में
भजिया और समोसे तलने को,
रिमझिम बूंदो में भीगकर
अन्तस् के सारे दुख घुलने को,
सोंधी सोंधी मिट्टी की
खुशब तन मन मे बसने को,
एक एक जीव के मन को संतृप्त करने को
आयी बरखा एक एक कोने को तृप्त करने को..
सुप्रिया "रानू"
Wednesday, May 15, 2019
तुम्हारी छाया
मेरा अस्तित्व मेरी पहचान
मेरा शरीर मेरा नाम
तुम जैसा तुम्हारी प्रतिछाया हूँ
माँ जीवन मे मेरे
तुम देह और उस देह से बनने वाली छाया हूँ मैं...
तुमसे तुमसी जनि,
तुमसे तुमसी बनी,
जीवन संघर्षों में तपी,
तपकर कुंदन में ढली,
तुमने जना था सोना
तभी तो आज मतलब रखता
है मेरे इस जीवन का होना,
तुमसी बनी तुम्हारी काया हूँ मैं,
तुम देह,और उस देह से बननेवाली छाया हूँ मैं...
तुमसे सीखा दुख में हँसना,
और सुख को चुपचाप तकना,
तुमसे जाना कभी चुपचाप सामाजिक नियमो को मान जाना
तो कभी अपनी घुटन पर आवाज उठाना,
मैं भिन्न नही नारी से,
वही सामाजिक जाल में उलझी
नारी की माया हूँ,
तुम देह और उस देह से बनने वाली छाया हूँ...
मेरा अस्तित्व मेरी पहचान
मेरा शरीर मेरा नाम,
तुम जैसी तुम्हारी प्रतिछाया हूँ,
माँ जीवन मे मेरे
तुम देह सी और मैं उस देह से बनने वाली छाया हूँ....
सुप्रिया"रानू"
Saturday, April 6, 2019
नार और नृत्य
जीवन मे पग पग पर,
तुमने नित नव नव रूप बनाये,
अपनी बुद्धि और आत्मबल से,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।
जब आयी विषमताएं जीवन मे,
तो तुम सीता सी संग राम के वन में गयी,
और आत्मसम्मान की रक्षा में,
वही स्वरूप धरा में समाए
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।
पति प्रेम में अपना जीवन भुल,
कभी सती होने को जीवित ही,
तन मन मे अग्नि लपटाए,
तो कभी प्रेम वश सावित्री बन
जा यम से प्राण पति के छीन लाये,
ओ नार !
तुमने जीवम से कई नृत्य कराए।
तुम दमित रही,कुचलित रही,
अब भी मर्यादाओं से छलित रही,
न जाने कितनी बार समाज ने
तुम्हारे फैले पंखों को दरवाजों के अंदर चुनवाये,
फिर भी तुम काली बनी
दुर्गा कहलाये
ओ नार !
तुमने जीवन से कई नृत्य कराए।
तोतली आवाज़ में
पिता के मन का सुकुन बन जाती हो,
राखियों में लिपटकर
भाई का हर साहस बन जाती हो,
एक अंगुल सिंदूर से
प्राण पति का बचाती हो,
दुग्ध का अमृत पान कर के
पुत्र को सबल बनाती हो,
बहु एयर बेटी स्वरूप
घर घाट में तुलसी बन जाती हो
जीवन के हर रण में
आपमे अदम्य साहस से जीत के बिगुल बजाए,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।
रात की कालिमा यूं आंखों में सजाये,
सुबहवकी सूर्य सी लालिमा ललाट पर लगाये,
हाथों में ऊर्जा की मेहंदी लगाए
और गेशुओं में महकते खिलते
बगीचे सजाये,
अद्भुत सुंदरता का रूप तुममे समाए,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।
सुप्रिया "रानू"
ओ धरा अभी चुप रहना
ओ धरा अभी चुप रहना, अपनी सुविधाओं के असीम विस्तार से, कुछ धनोपार्जन और कुछ आलास के बाजार से, धीरे धीरे तुम्हे लोप करते जाने के व्यापार से, ब...
-
कैसे करे सफलता आलिंगन जब तक मन न बने स्व अवगुण का दर्पण। बंदिश मुक्त रखा बच्चों का बचपन, आस संजोए मात-पिता मन ही मन। उभरे बच्चों में हर तरह ...
-
होती हैं थोड़ी अल्हड़,थोड़ी बिंदास घूमती रहती हैं आजीवन धुरी बन कर अपनी माँ के आसपास माँ की अनुपस्थिति, और जिम्मेवारियों का बोझ बना देता है उ...
-
हैं इक्षाएँ जीवित, है मन समर्पित, कर्म का आधार है निहित, तो संभावनाओं की बाट न जोहो, संग हवा के संग पक्षियों के बहो, अपनी कर्मठता को आध...