Wednesday, May 15, 2019

तुम्हारी छाया

मेरा अस्तित्व मेरी पहचान
मेरा शरीर मेरा नाम
तुम जैसा तुम्हारी प्रतिछाया हूँ
माँ जीवन मे मेरे
तुम देह और उस देह से बनने वाली छाया हूँ मैं...

तुमसे तुमसी जनि,
तुमसे तुमसी बनी,
जीवन संघर्षों में तपी,
तपकर कुंदन में ढली,
तुमने जना था सोना
तभी तो आज मतलब रखता
है मेरे इस जीवन का होना,
तुमसी बनी तुम्हारी काया हूँ मैं,
तुम देह,और उस देह से बननेवाली छाया हूँ मैं...

तुमसे सीखा दुख में हँसना,
और सुख को चुपचाप तकना,
तुमसे जाना कभी चुपचाप सामाजिक नियमो को मान जाना
तो कभी अपनी घुटन पर आवाज उठाना,
मैं भिन्न नही नारी से,
वही सामाजिक जाल में उलझी
नारी की माया हूँ,
तुम देह और उस देह से बनने वाली छाया हूँ...

मेरा अस्तित्व मेरी पहचान
मेरा शरीर मेरा नाम,
तुम जैसी तुम्हारी प्रतिछाया हूँ,
माँ जीवन मे मेरे
तुम देह सी और मैं उस देह से बनने वाली छाया हूँ....
सुप्रिया"रानू"

Saturday, April 6, 2019

नार और नृत्य

जीवन मे पग पग पर,
तुमने नित नव नव रूप बनाये,
अपनी बुद्धि और आत्मबल से,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।

जब आयी विषमताएं जीवन मे,
तो तुम सीता सी संग राम के वन में गयी,
और आत्मसम्मान की रक्षा में,
वही स्वरूप धरा में समाए
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।

पति प्रेम में अपना जीवन भुल,
कभी सती होने को जीवित ही,
तन मन मे अग्नि लपटाए,
तो कभी प्रेम वश सावित्री बन
जा यम से प्राण पति के छीन लाये,
ओ नार !
तुमने जीवम से कई नृत्य कराए।

तुम दमित रही,कुचलित रही,
अब भी मर्यादाओं से छलित रही,
न जाने कितनी बार समाज ने
तुम्हारे फैले पंखों को दरवाजों के अंदर चुनवाये,
फिर भी तुम काली बनी
दुर्गा कहलाये
ओ नार !
तुमने जीवन से कई नृत्य कराए।

तोतली आवाज़ में
पिता के मन का सुकुन बन जाती हो,
राखियों में लिपटकर
भाई का हर साहस बन जाती हो,
एक अंगुल सिंदूर से
प्राण पति का बचाती हो,
दुग्ध का अमृत पान कर के
पुत्र को सबल बनाती हो,
बहु एयर बेटी स्वरूप
घर घाट में तुलसी बन जाती हो
जीवन के हर रण में
आपमे अदम्य साहस से जीत के बिगुल बजाए,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।

रात की कालिमा यूं आंखों में सजाये,
सुबहवकी सूर्य सी लालिमा ललाट पर लगाये,
हाथों में ऊर्जा की मेहंदी लगाए
और गेशुओं में महकते खिलते
बगीचे सजाये,
अद्भुत सुंदरता का रूप तुममे समाए,
ओ नार !
तुमने जीवन को कई नृत्य कराए।

सुप्रिया "रानू"

Friday, March 29, 2019

अश्क़ों की ज़ुबानी

कैसे कहें अपनी आपबीती
कोई कहानी, इन अश्कों की जुबानी,

बेवक़्त आते ज़रूर है,
पर कोई एहसास ही
झिड़क जाता है इन्हें,
आंखों की गहराई में डूबे
मोतियों सरीखे अश्क़
पलको से छिड़क जाता है इन्हें,

कहूँ जो रोकर कोई लफ्ज़
तो कमजोर समझ लेती है दुनिया,
अक्सर किसी की मार्मिकता पर
निकल जाने वाले अश्क़ों को देख
बेवकूफ समझ लेती है दुनिया,
पर ये कहाँ समझ पाते है कुछ भी
भावनाओं के गुबार में डूब कर
आंखों से सरक आते हैं कभी भी।

अब अश्क़ों का मोल भी कहाँ रह गया है,
कितनो के झूठ ने इनकी सत्यता छल गया है,
कोई रो भी ले तो अब झूठ मान लेते हैं लोग,
क्योंकि अब झूठ में भी अश्क़ों को दान देते हैं लोग,

इसलिए अब तन्हाई में ही
अश्क़ बहा लेती हूं,
सर रख दूँ कहीं
ऐसे कोई कंधे का
आसरा कहाँ लेती हूँ,
इन नादान मासूम अश्क़ों की लाज
बचा लेती हूँ,
झूठे लोगों से अपने आंसू छुपा लेती हूँ,
बचा लेती हूँ,इनकी मासूमियत सी हस्ती,
ताकि न बने झूठे आंसुओं की कहानी
ऐसे हालात में बताओ कैसे कह दूँ
अपनी आपबीती कोई कहानी
इन अश्क़ों की ज़ुबानी

सुप्रिया "रानू"

Friday, March 1, 2019

लिखूँ अगर समझ पाओ तो

मैं लिख दूँ अपने दिल की तमाम बातें
अगर तुम समझ पाओ तो,
डूब सको मेरी भावनाओं में,
शब्दों में छुपे भाव पढ़ पाओ तो,
मैं लिख दूँ अपने दिल की तमाम बातें,

कह दूँ सारे दर्द,
अगर मेरे शब्दों में छुपे
आँसू छलक जाएं तुम्हारे आंखों में,
भर दूँ अपनी सारी मुस्कुराहटें शब्दों में
अगर वो तुम्हारे अधरों पर बिखर जाएं तो,

शब्दों में छुपे भाव पढ़ पाओ तो...

वो सब बातें जो मैं सम्मुख हो कह नही पाती,
शब्दों में उतार दूँ,
अगर तुम मौन हो सब मेरे मन से समझ सको तो,
वो सारी बंदिशे तोड़ आऊं,
अगर तुम बेझिझक मेरा हाथ थाम पाओ तो,

शब्दों में छुपे भाव पढ़ पाओ तो...

मैं शब्दों में लगा के पर उड़ आऊँ
खुले आसमान में अगर तुम मेरी उड़ान समझ पाओ तो,
मैं शब्दों में खुल के साँसे ले पाऊं,
अगर तुममेर विस्तार समझ पाओ तो,

मैं जी लूँगी एक मनचाही से ज़िन्दगी
अगर तुम मेरे शब्द समझ पाओ तो..

शब्द में छुपे भाव पढ़ पाओ तो..
सुप्रिया "रानू"

Thursday, January 17, 2019

आत्मव्यथा

अपनी डायरी का एक पृष्ठ साझा कर रही हूँ,

पहली बार ब्लॉग पर गद्य लिखने की कोशिश है, लगभग एक महीने बाद आज लेखन के लिए बैठ पाई हूँ, जीवन की  कई कड़ी परीक्षाएं देकर उतीर्ण हुई हूँ,फिर से एक परीक्षा चल रही उतीर्ण होने की हर मानदंडों पर खरी उतरने में लगी हूँ,
अभी अगले साल मार्च में मेरी शादी को दो वर्ष होंगे,इस बीच का वक़्त बेहद खुशनुमा बिता गत मास 20 तारीख को जीवनसंगी का बाइक से ऑक्सीडेंट हुया,वो बिस्तर पर और मै मैदाने जंग में,इस जंग में तनिक भी डर न हुआ कि उन्हें कुछ होगा माँ कि सात साल कि सेवा और इलाज जगह जगह अस्पतालों डॉक्टरों का चक्कर और वो 7 साल उनका बिस्तर पर ही रहना जीवन के बहुत सारे पहलू सीखा चुका था,अनभिज्ञता नही थी मेरे अंदर न हॉस्पिटल से न इलाज से न इनके दर्द से,मैं चुकी जंतु विज्ञान से ही अध्ययनरत रही हूँ, तो मन मे एक छाप है कि इलाज भले ही कष्टकारी होगा पर अंततः यह हमारा भला ही करेगा सो मैं एक पल को भी नही झिझकी इनका spleen damage  हुआ 3 लिटर bleeding पेट के अंदर, एक पल को भी न डर न भय न ही कोई शंका surgery के लिए consent sign करते वक़्त की कुछ हो सकता है इनको,मानो सावित्री की आत्मा हो मेरे अंदर चाहे जो हो जाये इनको तो बचा ही लूँगी,3 ribs के fracture, shoulder का dislocation और फिर toe का fracture उसकी surgery सब कुछ एक मशीन की तरह कर रही थी ICU के 10दिन और उसके 24 घंटे  एक stool पर बैठ कर बिताना कुछ भी असंभव और अर्थहीन न लगा सब मानो मेरे जीवन का परम कर्तव्य हो,मेरा भाई जो मेरा सबसे बड़ा सम्बल है जीवन का, वो इनसे मिलकर रो पड़ा पर मेरे लिए अश्रु निकल पाने का भी समय न था मानो सब सहेज रखा हो अंतस में,
ये हरपल मेरी आँखों के सामने थे एक पल को इनकी कमी महसूस न हुई,
लेकिन कहते हैं न ईश्वर भी सब सोच समझ कर रचता है,खली इनकी कमी मुझे,
उस दिन जिस दिन इनके घरवालों के मुँह से निकला कि मुझसे शादी हुई इसलिए accident हुआ ।

21वीं सदी और ये वाक्य पढ़े लिखे लोग इनके पिता जिन्होंने संस्कृत और हिंदी में स्नातकोत्तर किया है और ये शब्द उनके मुंह से..
विस्मय नही मेरे चेहरे पर हृदय पर एक गहरी चोट लगी इसलिए नही मैं दोषारोपित हुई,अपितु इसलिए कि मेरी दादी की जीवनी उनकी दादी की सबके बहूओं की जीवनी,सबकी यही कहानी थी,और इतने सदियों बाद आज मेरी भी।
यकीन नही हो रहा था कौन समाज कैसी बढ़ोतरी,कैसा विकास,यूं तो बाते कहने में और लिखने में आज तक मुझे भी अच्छी लगती हैं,लिंगभेद खत्म हो रहा,आज स्त्रियां पुरुषों के बराबरी में है,ये कौन सी बराबरी है,आज मुझे कुछ हुआ रहता,तो क्या यही लोग कहते कि मेरे बेटे से शादी हुई इसलिए ऐसा हुआ,
कुछ भी नही बदला नारी खुद को भी नही बदल पाई है कमियां तो मुझे खुद में भी दिखी मैं एक शब्द न बोली अब खुद से पूछ रही हूं क्या मेरी खामोशी इस बात की स्वीकार्यता थी....

यह एक पहलू था इस घटना का और न जाने कितने पहलुओं को देख मैंने, सांसारिकता,स्वार्थ,रिश्ते,रिश्तों का वास्तव में अर्थ,समय आते ही स्वार्थ के चयन बहुत बार सोचा व्यक्तिगत बातें सामाजिक मंच पर न रखूं लेकिन ये सारी बातें व्यक्तिगत न हैं समाज मे चली आ रही सदियों से कुछ गलत चीजें हैं जिन्हें बदलना बहुत जरूरी है।
सुप्रिया"रानू"

Wednesday, December 12, 2018

मैं शिशिर की सर्द रातों सी

मैं शिशिर की सर्द रातों सी,
तुम ओश को पिघलाते नर्म
गुनगुनी धूप सरीखे...

मैं शिशिर में फैले
घने गहरे कोहरे की तरह,
तुम खिलते सरसो के टेसू
मैं शिशिर की पाले और ओले,
तुम आँख मिचते खिलते
छुपते सूरज से...
मैं शिशिर की ठंडी सर्द
हवाओं सी
तुम गर्म शाल की गर्मी से...
मैं तिल और मूंगफलियों से,
तुम चाशनी सरीखे
मेरी मिठाश समेटने वाले,

मैं शिशिर की सर्द रातों सी..
तुम ओश को पिघलाते
नर्म गुनगुनी धूप सरीखे..

मैं उन्मुक्त आकाश सी
तुम सीमाओं की प्राचीर बनो,
मैं जहाँ भी थक जाऊँ राहों में,
तुम मेरे मन का धीर बनो,
मैं क्षण क्षण में खो भी जाऊँ,
तो तुम साथ अपना चिर रखो,
मैं सज्जा तो तुम
उस ओर खिलने वाले रूप सरीखे,
मैं शिशिर की सर्द रातों सी
तुम खिलते नर्म
गुनगुनी धूप सरीखे...

सुप्रिया "रानू"

Monday, December 3, 2018

शब्द लिख देते जो भाव सारे

शब्द लिख देते जो भाव सारे,
प्रफुल्लित मन
और हृदय के घाव सारे,
फिर अश्रुओं का स्थान क्या रह जाता,
लिख डालते जो दर्द सारे
तो फिर भावों का मान क्या रह जाता,

हो जाता है असमर्थ लेखन भी
कुछ भावों को व्यक्त कर पाने में,
कैसे लिखूं ठंड की नरम से धूप
की हल्की गरम नर्माहट,
कैसे लिखूं अंधेरों से झांकते सूरज
की ललिमाओं की हल्की सी आहट,
कैसे लिख दें शब्दों की वर्णमाला
नरम कोमल दुभों पर ओशों के बिखर जाने की चाहत,

शब्द लिख देते जो...

कैसे लिख दूँ, इंतज़ार में ताकते नयन
या फिर मिलान की खुशी के आँसू की चमक
कैसे बाँधू शब्दों में किसी के न होने
और लौट के न आने का गम
कैसे उत्तर दूँ शब्दों ये आंखें नम,
शब्द बेशक बेजान हो जाते हैं कभी कभी,
पर भुला भी दूँ कैसे
शब्द जो उतर जाते हैं दिल मे
शब्द जो बाह जाते हैं आंखों से
शब्द जो कह जाते हैं अनकहे बात सारे..

शब्द जो लिख....
सुप्रिया"रानू"

ओ धरा अभी चुप रहना

ओ धरा अभी चुप रहना, अपनी सुविधाओं के असीम विस्तार से, कुछ धनोपार्जन और कुछ आलास के बाजार से, धीरे धीरे तुम्हे लोप करते जाने के व्यापार से, ब...